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| ऑटो में ठूंस-ठूंसकर बैठाए गए छात्र-छात्रआएं? |
अनूप महतो, सिल्ली (रांची) : कहते हैं बच्चे देश का भविष्य होते हैं, लेकिन सिल्ली के सिंगपुर कांटाडीह क्षेत्र में देश के 'भविष्य' को ऑटो की पिछली सीट और ड्राइवर की साइड वाली खाली जगहों में ऐसे पैक किया जा रहा है, जैसे किसी बोरी में आलू-प्याज ठूंस दिया गया हो! मामला है सिंगपुर कांटाडीह स्थित आरटीसी स्कूल का, जहां रोज सुबह-शाम बच्चों की जिंदगी से सरेआम खिलवाड़ हो रहा है।
नियमों की धज्जियां उड़ा बैठा रहे 15-20 बच्चे
मोटर वाहन अधिनियम (MVA) की किताब खोलिए तो साफ-साफ लिखा है- ऑटो मतलब ‘ड्राइवर + 3 सवारी’ यानी कुल चार। लेकिन, आरटीसी स्कूल जाने वाले इन ऑटो वालों का गणित बिल्कुल अलग है। यहां एक तीन पहिए वाली गाड़ी में 15 से 20 मासूमों को ठूंस-ठूंस कर भर दिया जाता है। बच्चे इतने सटे होते हैं कि उन्हें सांस लेने तक में पसीने छूट जाते हैं। लटके हुए बच्चों को देखकर लगता है कि जरा सा झटका लगा नहीं कि कोई मासूम सड़क पर।
ओवरलोडिंग का सीधा गणित है- ना सही से ब्रेक लगेगा, ना गाड़ी का बैलेंस रहेगा। और दुर्घटना? वो तो जैसे मोड़ पर इंतजार ही कर रही है।
हादसे हो चुके हैं, पर साहब लोगों की नींद नहीं टूटी
ऐसा भी नहीं है कि ये सब पहली बार हो रहा है। ओवरलोडिंग की वजह से पहले भी गाड़ियाँ पलटी हैं, हादसे हुए हैं। बच्चे बाल-बाल बचे हैं। लेकिन स्थानीय प्रशासन और स्कूल प्रबंधन? अरे साहब! उन्होंने तो अपनी आँखों पर वो 'गांधारी वाली पट्टी' बांध रखी है, जिसे हादसों की चीखें भी नहीं खोल पातीं। सब जानते हैं कि बच्चे अपनी जान हथेली पर रखकर स्कूल पहुँच रहे हैं, पर जिम्मेदार अपनी एसी गाड़ियों में बैठकर ऑल इज वेल का झुनझुना बजा रहे हैं।
कागज? वो किस चिड़िया का नाम है!
इलाके के जानकारों का दांव है कि सड़क पर बच्चों को ढो रहे आधे से ज्यादा ऑटो वालों के पास ना तो गाड़ी के कागज़ात पूरे हैं और ना ही चालकों के पास पक्का ड्राइविंग लाइसेंस। कुल मिलाकर गाड़ियां इंसान नहीं, पूरी तरह 'ऊपर वाले के भरोसे' चल रही हैं। अब सवाल सीधा स्कूल प्रबंधन और आरटीसी इलाके के ट्रैफिक-पुलिस कप्तानों से है, क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही आपकी कुंभकर्णी नींद टूटेगी? या जब तक किसी घर का चिराग नहीं बुझेगा, तब तक इन 'चलता है' वाले रवैये पर ब्रेक नहीं लगेगा?

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