GA4-314340326 सुदिव्य के निधन को जगरनाथ-रामदास से जोड़ना गलत, सीएम हेमंत सोरेन ने पहले ही अफवाहों पर लगा दिया था विराम

सुदिव्य के निधन को जगरनाथ-रामदास से जोड़ना गलत, सीएम हेमंत सोरेन ने पहले ही अफवाहों पर लगा दिया था विराम

Linking Sudivya's demise to Jagarnath and Ramdas is incorrect; CM Hemant Soren had already put an end to the rumors.
अनिल कुमार चौधरी / अनगड़ा (रांची ): झारखंड सरकार के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के शनिवार देर रात निधन के बाद इंटरनेट/सोशल मीडिया पर एक खबर तेजी से वायरल हो रही है कि हेमंत सोरेन सरकार में झामुमो ‌विधायकों के लिए शिक्षा मंत्रालय ‘पनौती’ साबित हो रहा है। हर खबर में यह दावा किया जा रहा है कि हेमंत सोरेन सरकार के पहले कार्यकाल में शिक्षा मंत्री के रूप में जगरनाथ महतो ने अपनी मजबूत कार्यशैली से एक अलग पहचान बनाई थी। कोरोना काल में संक्रमित होने के बावजूद वे लगातार सक्रिय रहे। संक्रमण से उनका फेफड़ा खराब हो गया। लंबी बीमारी के बाद 6 अप्रैल 2023 को बेंगलुरू के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। 

इसके बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झामुमो के कद्दावर नेता रामदास सोरेन को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी, उनका भी कार्यकाल के दौरान ही निधन हो गया। अब शिक्षा मंत्रालय की कमान संभाल रहे सुदिव्य कुमार सोनू का अचानक हार्ट अटैक से निधन हो गया। 

मुख्यमंत्री ने अफवाहों पर लगा दिया था विराम

लेकिन, इन सभी खबरों में तकनीकी चूक यह है कि जगरनाथ महतो और रामदास सोरेन हेमंत सरकार में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग नहीं, बल्कि स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के मंत्री थे। इन दोनों के समय उच्च शिक्षा ‌व तकनीकी विभाग खुद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन संभाल रहे थे। दोनों के निधन के बाद इसी तरह की चर्चा उठी थी तब उस पर विराम लगाने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्कूली शिक्षा और सारक्षता विभाग अपने पास रख लिया था और उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग अपने सबसे भरोसेमंद विधायक सुदिव्य कुमार सोनू को सौंप दिया था। 

  भ्रामक खबरों पर ध्यान न देने की अपील

राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा है कि दिवंगत मंत्रियों जगरनाथ महतो, रामदास सोरेन और अब सुदिव्य कुमार सोनू का दुनिया से चले जाना झारखंड की राजनीति, झामुमो और पूरे राज्य के लिए अपूरणीय क्षति है। इन नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों और जनसेवा में जो अमिट छाप छोड़ी है, उसे महज संयोग या सनसनीखेज अफवाहों से जोड़कर देखना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि दिवंगत नेताओं के संघर्षपूर्ण राजनीतिक जीवन और उनके योगदान के प्रति भी अनुचित है। इसलिए, आम लोगों से अपील की है कि सोशल मीडिया पर बिना तथ्यों की जांच किए परोसी जा रही ऐसी भ्रामक और अंधविश्वासी खबरों पर बिल्कुल ध्यान न दें।

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