GA4-314340326 कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने को साझा प्रयास जरूरी... गिरिडीह कोर्ट में हुई पॉश कानून पर चर्चा

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने को साझा प्रयास जरूरी... गिरिडीह कोर्ट में हुई पॉश कानून पर चर्चा

  

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने को साझा प्रयास जरूरी... गिरिडीह कोर्ट में हुई पॉश कानून पर चर्चा
अमित सहाय/गिरिडीह : राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकार और झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार के तत्वाधान में मंगलवार को व्यवहार न्यायालय गिरिडीह परिसर में पॉश (POSH) कानून, लैंगिक संवेदनशीलता और इससे जुड़ी चुनौतियों से निपटने की रणनीति विषय पर सेमिनार सह जागरूकता कार्यक्रम आयोजित हुआ।

​कार्यक्रम का शुभारंभ प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश मार्तंड प्रताप मिश्रा, प्रधान जिला कुटुंब न्यायालय संतोष कुमार, जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रथम कंवलजीत चोपड़ा, अष्टम रवि शंकर मिश्रा, षष्टम प्रीति कुमारी, जिला अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष प्रकाश सहाय और सचिव चुन्नूकांत ने संयुक्त रूप से किया।

​सर्वोच्च न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता विभा दत्ता मखीजा ने कार्यक्रम को ऑनलाइन संबोधित करते हुए पॉश कानून के विभिन्न कानूनी और व्यावहारिक पहलुओं की विस्तार से जानकारी दी। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश मार्तंड प्रताप मिश्रा ने कहा कि इस कानून के प्रभावशाली क्रियान्वयन के लिए समाज और कार्यस्थल से जुड़े सभी लोगों के साझा प्रयास आवश्यक हैं।

​जिला विधिक सेवा प्राधिकार के सचिव सफदर अली नैयर और मंच पर मौजूद अतिथियों ने भी विषय पर विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी स्मृति त्रिपाठी ने किया, जबकि इसके सफल आयोजन में सचिव मो. सफदर अली नैयर और न्यायाधीश प्रभारी मो. दानिश नवाज की प्रमुख भूमिका रही। इस अवसर पर गिरिडीह न्यायमंडल के न्यायिक अधिकारी, जिला अधिवक्ता संघ के अधिवक्ता, न्यायालय कर्मी और पारा लीगल वॉलिंटियर्स उपस्थित थे।

​क्या है पॉश (POSH) कानून

​POSH का पूरा नाम Prevention of Sexual Harassment (कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न - निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष अधिनियम, 2013) है।

 * ​उद्देश्य: यह कानून महिलाओं को कार्यस्थल (सरकारी, निजी या असंगठित क्षेत्र) में यौन उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करता है और एक सुरक्षित, भयमुक्त माहौल सुनिश्चित करता है।

* ​आंतरिक शिकायत समिति (ICC): 10 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले हर संस्थान में इस कानून के तहत 'आंतरिक शिकायत समिति' बनाना अनिवार्य है, जहाँ पीड़िता अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है।

* जांच एवं कार्रवाई: समिति को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्राप्त होती हैं, जो निष्पक्ष जांच कर दोषी पर दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश करती है।





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