GA4-314340326 सिल्ली : स्कूल में पीने के पानी से आ रही लोहे की गंध, फंड के फेर में उलझा बच्चों का स्वास्थ्य

सिल्ली : स्कूल में पीने के पानी से आ रही लोहे की गंध, फंड के फेर में उलझा बच्चों का स्वास्थ्य

Silli: Drinking water at school smells of iron, children's health jeopardized by funding issues
क्लासरूम में जमीन पर बैठे बच्चे।
 सिल्ली (रांची) : प्रखंड के सरकारी स्कूलों में कागजी दावों और जमीनी हकीकत का फासला किसी से छिपा नहीं है। सरकारें बदलती रहीं, बड़े-बड़े दावे और वादे भी होते रहे, लेकिन बुनियादी ढांचा आज भी बदहाल है। कहीं शिक्षकों की भारी कमी है, तो कहीं जर्जर भवन, बदहाल शौचालय और पीने के साफ पानी का संकट।

ऐसा ही एक ताजा मामला शुक्रवार को सिल्ली प्रखंड के उत्क्रमित उच्च विद्यालय, गोड़ाडीह में देखने को मिला, जहां पीने के पानी की समस्या को लेकर ग्रामीणों को स्कूल परिसर में ही बैठक करने पर मजबूर होना पड़ा।

पानी में लोहे की गंध, बच्चों की सेहत दांव पर

ग्रामीणों के मुताबिक, स्कूल में जो बोरिंग कराई गई है, उससे निकलने वाले पानी से लोहे (आयरन) की तेज गंध आ रही है। इस दूषित पानी को पीने से बच्चों के बीमार होने का खतरा बना हुआ है। समस्या के समाधान के लिए ग्रामीणों ने मौके पर मौजूद पंचायत की मुखिया सावन देवी को तुरंत नया चापाकल लगवाने के लिए आवेदन सौंपा।

 मुखिया व प्रधानाध्यापिका के दावों से फंसा पेंच

चापाकल लगाने की मांग पर मुखिया सावन देवी ने कहा कि हाल ही में विधानसभा चुनाव के दौरान 14वें वित्त आयोग की राशि से यहां नई बोरिंग कराई गई है। ऐसे में तुरंत नया चापाकल लगाना संभव नहीं है। अगर बोरिंग में कोई खराबी है, तो स्कूल को उसका मेंटेनेंस कराना चाहिए। इससे पहले भी जल-नल योजना के तहत दो बार बोरिंग की गई थी, जो खराब पड़ी है। विभाग से मिलने वाले मेंटेनेंस फंड का स्कूल कहां इस्तेमाल करता है, इसकी जानकारी किसी को नहीं है।

दूसरी ओर, स्कूल की प्रधानाध्यापिका शांति टोप्पो ने मुखिया के आरोपों को खारिज करते हुए साफ कहा कि फिलहाल विद्यालय फंड में कोई राशि उपलब्ध नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर फंड नहीं है, तो बच्चे दूषित पानी पीने को कब तक मजबूर रहेंगे।

 400 छात्र, पर बैठने को बेंच नहीं

स्कूल की बदहाली का आलम यह है कि यहां पहली से लेकर दसवीं कक्षा तक कुल 400 छात्र-छात्राएं नामांकित हैं, लेकिन उनके बैठने के लिए पर्याप्त बेंच-डेस्क तक नहीं हैं। स्कूल के एक शिक्षक ने बताया कि जो कुछ बेंच हैं भी, वे टूटी हुई हैं। मजबूरन बच्चों को जमीन पर दरी और टाट-पट्टी बिछाकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। डिजिटल और स्मार्ट क्लास के दौर में बच्चे जमीन पर बैठकर भविष्य गढ़ने को मजबूर हैं।

सिर्फ रजिस्टर और MDM की जांच, पढ़ाई की नहीं

निरीक्षण व्यवस्था पर भी ग्रामीणों और शिक्षकों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। आरोप है कि सीआरसी (CRC) और बीआरसी (BRC) के अधिकारी सिर्फ खानापूर्ति के लिए स्कूल आते हैं अधिकारी केवल हाजिरी रजिस्टर, मिड-डे मील (MDM), यूनिफॉर्म और किताबों का हिसाब-किताब मांगते हैं। बच्चे क्या सीख रहे हैं, शिक्षक कैसे पढ़ा रहे हैं, इससे किसी को मतलब नहीं है। जबकि अधिकारियों को कम से कम 40 मिनट क्लास में बैठकर देखना चाहिए कि बच्चे पढ़ पा रहे हैं या नहीं। शिक्षकों को ऑन-स्पॉट सपोर्ट देना चाहिए कि कठिन विषय कैसे पढ़ाएं। साथ ही, स्कूल में छात्र-शिक्षक अनुपात और जर्जर बिल्डिंग की रिपोर्ट उच्च अधिकारियों तक पहुंचानी चाहिए, जो नहीं हो रहा।

मामला संज्ञान में आया है। हम स्थिति को देख रहे हैं। हमारे पास मेंटेनेंस का सामान उपलब्ध होते ही खराबी को दूर कर दिया जाएगा। -जगमोहन मुंडा, विभागीय जेई



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