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| बांस में अर्थी को लटका कर ले जाते परिजन। |
शून्य होती संवेदना: अर्थी को नहीं मिले चार कंधे
दुलोरी गांव में एक महिला की अंतिम यात्रा के दौरान मानवता उस वक्त सिसक उठी, जब शव को श्मशान तक ले जाने के लिए गांव से चार लोग तक नहीं जुटे। जिस अर्थी को समाज का सहारा मिलना चाहिए था, वह अपनों की बेबसी के बीच एकाकी खड़ी रही। अंततः, भारी मन और आंसुओं के साथ परिजनों को स्वयं ही अंतिम संस्कार की सारी प्रक्रियाओं को पूरा करना पड़ा।
शिक्षित समाज की 'अशिक्षित' सोच?
हैरानी की बात यह है कि दुलोरी गांव कोई पिछड़ा इलाका नहीं है। यहां डॉक्टरों, इंजीनियरों, शिक्षकों और कथित समाजसेवियों की एक बड़ी जमात रहती है। लेकिन जब एक परिवार को सामाजिक सहयोग की सबसे अधिक जरूरत थी, तब ये 'प्रतिष्ठित' वर्ग घरों में दुबके रहे। किसी ने निजी व्यस्तता का तर्क दिया, तो किसी ने सामाजिक दूरी का चोला ओढ़कर खुद को अलग कर रखा है। शोकाकुल परिवार न केवल अपनों को खोने के गम में था, बल्कि समाज की इस निष्ठुरता ने उन्हें गहरा मानसिक आघात भी पहुंचाया।
आधुनिकता के बीच लुप्त होते मानवीय मूल्य
इस घटना ने पूरे क्षेत्र में आक्रोश और आत्ममंथन की लहर पैदा कर दी है। स्थानीय ग्रामीणों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि अंतिम संस्कार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता का प्रतीक होता है। यदि शिक्षा और आर्थिक समृद्धि के बाद भी हम एक अर्थी को कंधा देने की संवेदना खो चुके हैं, तो यह समाज के पतन का स्पष्ट संकेत है।

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