GA4-314340326 सिमडेगा में सामुदायिक गोबर गैस संयंत्र से बदली ग्रामीणों की तकदीर

सिमडेगा में सामुदायिक गोबर गैस संयंत्र से बदली ग्रामीणों की तकदीर

Community biogas plant changes the fortunes of villagers in Simdega
गांव में बने गोबर गैस प्लांट के पास खड़े ग्रामीण।
सिमडेगा (novbhaskar): स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत सिमडेगा जिला प्रशासन की अनूठी पहल रंग लाई है। बोलबा और ठेठईटांगर प्रखंडों में स्थापित सामुदायिक गोबर गैस संयंत्र ग्रामीण विकास का एक नया और प्रभावी मॉडल बनकर उभरे हैं। इस अभिनव प्रयास ने न केवल ग्रामीण परिवारों को धुएँ से मुक्ति दिलाई है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जैविक खेती को भी नया आयाम दिया है।

धुएं के अभिशाप से मिली मुक्ति

बोलबा प्रखंड के समसेरा पंचायत स्थित बोलबा मुखिया टोली में 30 घनमीटर (CUM) क्षमता का सामुदायिक गोबर गैस संयंत्र लगाया गया है। यहां के सभी 19 परिवारों के पास पशुधन है और सभी को गैस कनेक्शन दिया गया है। अब इन परिवारों को प्रतिदिन तीनों समय भोजन पकाने के लिए पर्याप्त गैस मिल रही है।

पहले भोजन के लिए जंगलों से लकड़ियां लानी पड़ती थीं, जिससे महिलाओं का भारी समय और श्रम बर्बाद होता था। साथ ही रसोई के धुएँ से उनका स्वास्थ्य भी प्रभावित होता था। इस संयंत्र के आने से महिलाओं को धुएँ से पूरी तरह मुक्ति मिल गई है, और पेड़ों की कटाई रुकने से वन संरक्षण को भी बल मिला है।

जैविक खाद से संवर रही खेती

इस संयंत्र का सबसे बड़ा फायदा 'वेस्ट टू वेल्थ' यानी कचरे से संपदा का दिख रहा है। गैस निर्माण के बाद बचने वाली बायो-स्लरी उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद बन जाती है। किसान इस जैविक खाद का उपयोग अपने खेतों में कर रहे हैं, जिससे रासायनिक खादों पर निर्भरता घटी है और मिट्टी की उपजाऊ शक्ति तेजी से बढ़ रही है।

महिलाओं के हाथों में संचालन की कमान

संयंत्र के सुचारू संचालन के लिए ग्राम स्तर पर ठोस व्यवस्था की गई है। इसके रख-रखाव के एवज में प्रति परिवार ₹30 मासिक योगदान तय किया गया है। वहीं, इसकी निगरानी और संचालन की जिम्मेदारी कमल, सीता और जीवन आजीविका स्वयं सहायता समूहों को सौंपी गई है। इसके अलावा, निर्माण एजेंसी द्वारा अगले तीन सालों तक तकनीकी देखरेख भी सुनिश्चित की गई है।

बड़े फायदे एक नजर में

 स्वच्छ ईंधन : 19 परिवारों को नियमित रूप से गैस कनेक्शन की सुविधा।

 स्वास्थ्य सुधार : रसोई के धुएं से महिलाओं और बच्चों को मिली बड़ी राहत।

 पर्यावरण संरक्षण : जलावन के लिए पेड़ों की कटाई बंद, वन संपदा सुरक्षित।

 जैविक खेती : गोबर से तैयार हो रही उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद।

महिला सशक्तीकरण : स्वयं सहायता समूहों द्वारा सफल संचालन और रख-रखाव।




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