GA4-314340326 डिजिटल इंडिया के दावों को मुंह चिढ़ाती 'खाट एंबुलेंस' : 3 वीआईपी विधायकों वाले गिरिडीह में सड़क नहीं, प्रसव पीड़ा से तड़पती महिला को 4 किमी टांगकर ले गए ग्रामीण

डिजिटल इंडिया के दावों को मुंह चिढ़ाती 'खाट एंबुलेंस' : 3 वीआईपी विधायकों वाले गिरिडीह में सड़क नहीं, प्रसव पीड़ा से तड़पती महिला को 4 किमी टांगकर ले गए ग्रामीण

'Cot Ambulance' mocks Digital India's claims: Giridih, home to three VIP MLAs, has no road; villagers carry a woman in labour pain for 4 km on a stretcher
खटिया पर गर्भवती महिला को लेकर अस्पताल जाते ग्रामीण।
अमित सहाय/ गिरिडीह : आजादी के 75 साल बाद भी झारखंड के ग्रामीण इलाकों में व्यवस्था की बदहाली किस कदर हावी है, इसकी एक रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीर गिरिडीह से सामने आई है। राज्य सरकार की नाकामी और आम जनता की बेबसी का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को 'खाट' का सहारा लेना पड़ा।

यह स्थिति तब है जब इस जिले का प्रतिनिधित्व खुद सूबे के रसूखदार चेहरे करते हैं। गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र (निर्वाचन क्षेत्र संख्या-32) से झामुमो के कद्दावर नेता और शहरी विकास मंत्री सुदीव्य कुमार सोनू विधायक हैं, जबकि इसी जिले की अन्य सीटों से नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन जैसी वीआईपी शख्सियतें विधानसभा पहुंचती हैं। इसके बावजूद, पीरटांड़ प्रखंड का दालुवाडीह गांव आज भी एक अदद सड़क के लिए तरस रहा है। विकास के दावों की पोल खोलती यह घटना बताती है कि हुक्मरानों की बेरुखी ने आम आदमी की जान को दांव पर लगा दिया है।

 एंबुलेंसकर्मी ने कहा- 'सड़क नहीं है, हम नहीं आएंगे'

जानकारी के अनुसार, पीरटांड़ प्रखंड के मधुबन थाना क्षेत्र अंतर्गत दालुवाडीह गांव निवासी सुनीता सोरेन को बुधवार की सुबह अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिजनों ने फौरन स्वास्थ्य विभाग और सरकारी एंबुलेंस सेवा को फोन किया। लेकिन, सिस्टम की संवेदनहीनता देखिए- एंबुलेंस कर्मियों ने यह कहकर गांव आने से साफ मना कर दिया कि "आपके गांव तक सड़क ही नहीं है, गाड़ी कैसे आएगी?"

कीचड़ व पत्थरों के बीच 4 किमी का 'सफर-ए-दर्द'

जब सरकारी तंत्र ने हाथ खड़े कर दिए, तो ग्रामीणों और परिजनों ने खुद कमान संभाली। दर्द से तड़पती सुनीता को एक खाट (चारपाई) पर लिटाया गया। ग्रामीणों ने खाट को अपने कंधों पर उठाया और उबड़-खाबड़, पथरीले रास्तों पर पैदल ही चल पड़े। हालिया बारिश के कारण रास्ता कीचड़ से सना था, जिससे हर कदम पर फिसलने और हादसे का डर था। इस जानलेवा रास्ते पर करीब 4 किलोमीटर का सफर तय कर ग्रामीण पिपराडीह मुख्य सड़क तक पहुंचे। इसके बाद वहां से एक निजी वाहन का इंतजाम कर महिला को नजदीकी अस्पताल भेजा गया। एक ग्रामीण ने कहा- अगर हमारे गांव में सड़क और एंबुलेंस की सुविधा होती, तो एक गर्भवती महिला को इस तरह जान जोखिम में डालकर अस्पताल नहीं ले जाना पड़ता। चुनाव आते ही नेता वोट मांगने आ जाते हैं, लेकिन हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

 दावों की चमक में कब तक दम तोड़ेगी ग्रामीण व्यवस्था?

 सवाल 1. शहरी विकास मंत्री सुदीव्य कुमार सोनू के अपने क्षेत्र में जब ग्रामीण बुनियादी सड़क को तरस रहे हैं, तो राज्य के अन्य हिस्सों में विकास का क्या खाका होगा?

 सवाल 2. सत्ता और विपक्ष (बाबूलाल मरांडी व कल्पना सोरेन) दोनों के शीर्ष नेता इसी जिले से आते हैं, फिर भी पीरटांड़ के आदिवासियों को 'खाट एंबुलेंस' का सहारा क्यों लेना पड़ रहा है?

 सवाल 3. स्वास्थ्य विभाग की एंबुलेंस सेवा सिर्फ चौड़ी सड़कों के लिए है या सुदूर गांवों में रहने वाले गरीबों की जान बचाने के लिए भी?





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