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| डकरा में निर्माणाधीन साइलो प्लांट। |
दामोदर नदी के ऊपर से गुजरेगा कन्वेयर बेल्ट
परियोजना के पूर्ण होने के बाद पुरनाडीह परियोजना से कन्वेयर बेल्ट के माध्यम से कोयला सीधे केडीएच रेलवे साइडिंग तक पहुंचेगा। यह कन्वेयर बेल्ट दामोदर नदी के ऊपर से गुजरते हुए साइडिंग स्थित हॉपर में कोयला गिराएगा, जहां से अत्याधुनिक कंप्यूटरीकृत प्रणाली के जरिए रेलवे रैक में कोयले की लोडिंग की जाएगी। इससे कम समय में सुरक्षित, तीव्र और पूरी तरह प्रदूषण रहित कोयला परिवहन सुनिश्चित हो सकेगा।
सालाना 75 लाख टन कोयला डिस्पैच का लक्ष्य
एफएमसी परियोजना के तहत पुरनाडीह से 35 लाख टन और केडीएच परियोजना से 40 लाख टन यानी कुल 75 लाख टन वार्षिक कोयला डिस्पैच का लक्ष्य रखा गया है। सड़क परिवहन पर निर्भरता खत्म होने से सीसीएल को प्रतिवर्ष लगभग 50 करोड़ रुपये के डीजल खर्च की भारी बचत होने का अनुमान है। एनके एरिया के महाप्रबंधक अमिताभ कुमार तिवारी ने उम्मीद जताई है कि तय रफ्तार से कार्य जारी रहने पर अगले आठ महीनों में इस परियोजना के पहले चरण का संचालन शुरू हो जाएगा।
प्रदूषण और जाम से मिलेगी मुक्ति
अब तक खदानों से डंपरों के जरिए कोयला रेलवे साइडिंग तक पहुंचाया जाता था, जिससे रास्ते में उड़ने वाली धूल से गंभीर प्रदूषण फैलता था। भारी वाहनों की आवाजाही से सड़कों के जर्जर होने, कीचड़ और भीषण जाम की समस्या आम थी। साइलो परियोजना के शुरू होने से इन सभी समस्याओं से स्थानीय लोगों को हमेशा के लिए राहत मिल जाएगी।
जानिए, क्या है साइलो प्लांट
साइलो प्लांट (Silo Plant) एक ऐसा आधुनिक और विशाल भंडारण या लोडिंग ढांचा होता है, जिसका उपयोग थोक सामग्री (जैसे कोयला, अनाज, सीमेंट या रेत) को सुरक्षित रखने और तेजी से आगे भेजने के लिए किया जाता है।
कोयला उद्योग के संदर्भ में साइलो प्लांट की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
* भंडारण और लोडिंग : इसमें ऊपर से कोयला स्टोर किया जाता है और नीचे की तरफ बड़े हॉपर बने होते हैं, जहाँ से कंप्यूटरीकृत प्रणाली (Computerized System) के जरिए सीधे नीचे खड़ी मालगाड़ी (रेलवे रैक) में कुछ ही मिनटों में कोयला भर दिया जाता है।
* प्रदूषण मुक्त परिवहन : पारंपरिक तरीकों में डंपरों के जरिए कोयला ढोया जाता है जिससे भारी धूल उड़ती है। साइलो सिस्टम में पूरी प्रक्रिया ढके हुए कन्वेयर बेल्ट और साइलो के भीतर होती है, जिससे पर्यावरण में धूल नहीं फैलती।
* समय और लागत की बचत : इसमें लोडिंग का काम बेहद तेज होता है, जिससे पारंपरिक लोडिंग में लगने वाला समय और ट्रकों/डंपरों के डीजल पर होने वाला भारी खर्च बच जाता है।


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