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| पिता की अर्थी को कंधा देतीं बेटियां। |
जानिए क्या है पूरा मामला
सिल्ली के गेडेवीर निवासी 63 वर्षीय उद्धव बेदिया का शुक्रवार को सिंगपुर नर्सिंग होम में इलाज के दौरान निधन हो गया। परिजनों के अनुसार, अचानक तेज बुखार आने के बाद उन्हें दो-तीन दिन पहले नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। उद्धव बेदिया अपने पीछे पत्नी और तीन सुसंस्कारी बेटियों फुदुल देवी, सुनीता देवी और छोटी बेटी सनोका देवी को छोड़ गए हैं। खास बात यह है कि उन्होंने रांची में मजदूरी कर अपनी तीनों बेटियों की शादी की थी।
जब बेटियों ने उठाया फर्ज का कंधा
पिता के निधन के बाद जब अंतिम यात्रा का समय आया, तो बेटियों ने बेटों की कमी को महसूस नहीं होने दिया। बड़ी बेटी फुदुल देवी, सुनीता देवी, छोटी बेटी सनोका देवी और उनके बड़े भाई रथू बेदिया की बेटी पानेश्वरी देवी ने आगे बढ़कर खुद अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया और उन्हें घर से अंतिम विदाई के लिए रवाना किया।
स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि बेदिया समाज की पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार महिलाओं का श्मशान घाट तक जाने या मुखाग्नि देने का प्रावधान नहीं है। इस परंपरा का सम्मान करते हुए मृतक के दामाद रामनाथ मांझी ने मुखाग्नि दी। हालांकि, बेटियों द्वारा अर्थी को कंधा दिए जाने के इस साहसिक कदम ने यह साबित कर दिया कि शोक और फर्ज निभाने के मामले में अब बेटा और बेटी का भेद पूरी तरह मिट रहा है।
देखिए खबर का वीडियो
बदल रहा है समाज, टूट रही पुरानी सोच की दीवारें
यह घटना महज एक अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का एक मजबूत संदेश है। समाज में बरसों से यह मान्यता चली आ रही थी कि सिर्फ बेटा ही अर्थी को कंधा दे सकता है और मुखाग्नि दे सकता है। लेकिन सिल्की की इन बेटियों ने इस दकियानूसी सोच पर बड़ा प्रहार किया है।
आज जब बेटियां बेटों से चार कदम आगे बढ़कर हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं, तो अपनों की अर्थी को कंधा देना यह बताता है कि संतान केवल वंश नहीं बढ़ाती, बल्कि माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने में भी सबसे आगे रहती हैं। निःसंदेह, ऐसी बेटियां आज के समाज के लिए एक जीवंत मिसाल हैं। कहीं न कहीं, पिता भी अपनी इन जांबाज बेटियों को देखकर ऊपर से गर्व महसूस कर रहे होंगे।

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