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मामला सामने आने के बाद किया गया पौधरोपण |
बगैर मानक का हुआ पौधरोपण
पौधारोपण में मानक का भी ध्यान नहीं रखा गया। पौधारोपण के लिए फरवरी में दो फीट लंबा-चौड़ा व गहरा गडढा खोदा जाता है। ताकि समय के साथ गड्ढ़े में कीट, पत्ते आदि जमा होकर खाद बन जाए। गड्ढा को धूप मिले। लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं हुआ। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि पौधा 5 मीटर की दूरी पर और एक लाइन से दूसरे लाइन की दूरी तीन मीटर होनी चाहिए। लेकिन किसी भी नियम का पालन नही हुआ। पौधरोपण के दौरान जैविक खाद व दीमक रोधी दवा भी डालना होता है। लेकिन जब खबर छपने के बाद पौधरोपण शुरू हुआ तो फिर जैविक खाद, दीमक रोधी दवा कब डाला गया?? खुले में पौधरोपण गैबियन लगाकर करना है। लेकिन गैबियन भी नहीं लगाया गया। सवाल है जब वन विभाग ने लिखित रिपोर्ट दिया कि औसतन 97 फीसदी तक पौधरोपण सही है तो फिर आनन-फानन में पौधरोपण क्यों। वर्क आर्डर का उल्लेख नही है। चार वर्षीय इस योजना में कितने वाचर कार्यरत है। उनका पेमेंट डिटेल का उल्लेख नही है।
मामला सामने आने पर डेढ़ साल बाद वन विभाग ने दिया उपयोगिता प्रमाणपत्र
पथ निर्माण विभाग द्वारा वन विभाग को राशि निर्गत करने के डेढ़ साल बाद वन विभाग ने उपयोगिता प्रमाणपत्र उपलब्ध कराया। डेढ़ साल बाद उपयोगिता प्रमाण पत्र उपलब्ध कराना संदेह के घेरे में है। वन विभाग की इस योजना के लिए पथ निर्माण विभाग ने वन विभाग को 23 दिसंबर 23 को 5.07 करोड़ की राशि निर्गत कर दी। इसी बीच पौधरोपण की उपयोगिता प्रमाणपत्र देने को लेकर लगातार पथ निर्माण विभाग के कार्यपालक अभियंता ने वन विभाग को पत्राचार किया। जून 2025 में उपयोगिता प्रमाण पत्र के लिए पत्राचार किया गया था। लेकिन खबर छपने के बाद अचानक से वन विभाग रेस हुआ। और पैसा भुगतान करने के डेढ़ साल बाद वनविभाग ने पथ निर्माण विभाग को 26 जून 25 को पत्र लिखकर जानकारी दी।
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