GA4-314340326 पौरााणिक हाहे दुर्गा बाड़ी: मनौती पूरा होने के बाद आते है बकरा की बलि देने

पौरााणिक हाहे दुर्गा बाड़ी: मनौती पूरा होने के बाद आते है बकरा की बलि देने

दुर्गाबाड़ी हाहे में माता दुर्गा की प्रतिमा
अनिल कुमार चौधरी /angara(ranchi)  अनगड़ा प्रखंड के हाहे में स्थित दुर्गा मंदिर में 113 वर्षो से प्रतिमा पूजा हो रही है। एक ही चाला (फ्रेम) में प्रतिमा का निर्माण कर पौराणिक विधि-विधान से किया जाता है। आज भी यहां की पूजा पद्धति पौराणिक है। महानवमी के दिन यहां पर लोहरदगा, रामगढ़, रांची, बोकारो, खरसांवा सहित बंगाल के पुरूलिया जिला के अलावा अनगड़ा, ओरमांझी, नामकुम, कांके, बुंडू, सिल्ली से काफी संख्या में श्रद्धालु पूजा करने व बकरा की बलि देने आते है। तीन सौ से अधिक बकरे की बलि दी जाती है। नवरात्र के दौरान पूरा क्षेत्र भक्तिमय रहता है। उत्तम देवघरिया बताते है श्रद्धालुओं की मनौती पूरा होने पर श्रद्धालु़ बकरा का पूजा करने आते है।  

हाहे के जमींदार परशुराम देवघरिया ने किया था वर्ष 1910 में दुर्गाबाड़ी की स्थापना

 जमींदार के वंशज उत्तम देवघरिया
वर्ष 1910 में दुर्गा पूजा का प्रारंभ हाहे के जमींदार परशुराम देवघरिया ने किया था। परशुराम देवघरिया हाहे, हुटुप व खरसांवा के कुछ मौजा के जमींदार थे। आज इनके वंशज परपोता उत्तम देवघरिया इस पूजा पद्धति को पौराणिक स्वरूप में लगातार आगे बढ़ा रहे है। स्थापना के समय झालदा बंगाल के पुजारी प्रभोद चक्रवती व चास बोकारो के उज्जवल बनर्जी थे। वर्तमान में दोनों पुजारी के वंशज गुणोमय चक्रवती व श्रीपति बनर्जी पूजा करा रहे है। दोनों पुजारी पिछले चार दशक से लगातार पूजा कराते आ रहे है। उत्तम देवघरिया बताते है अभी भी पौराणिक विधि-विधान से माता की पूजा की जा रही है। वर्तमान दुर्गा मंडप को 80 के दशक में छत्त की ढलाई करके बनाया गया। इससे पूर्व पूजा पंडाल खपरैल था। 

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